हिंदी भाषा: यथार्थता का अवलोकन

हिंदी भाषा का इतिहास यूँ तो बहुत प्राचीन नहीं है, परन्तु इसकी उत्त्पत्ति का स्रोत ढूढने पर इसका इतिहास 1000 ईस्वी से दिखने लगता है. हिंदी इस्लामिक संस्कृति के छांव में पली और अंग्रेजों के संरक्षण में इसका विकास हुआ.

अगर हम इसके प्राचीन विकास पर नज़र डालें तो हम पायेंगे कि ….

वैदिक संस्कृत (छन्दस) से लौकिक संस्कृत पनपी, जो कि लौकिक कम, साहित्यिक संस्कृत ज्यादे है, क्योंकि लौकिक संस्कृत पाणिनि के व्याकरण के बाद काफी शुद्ध एवं परिनिष्ठित हुई. जिसे हम आज भी साहित्यिक या पूजा-पाठ के रूप में प्रयोग में लाते हैं. पाणिनि के व्याकरण (500 ईसा पूर्व) के बाद वैदिक संस्कृत तो बस वेदों की भाषा बनकर रह गई. फिर धीरे-धीरे प्राकृत का विकास हुआ, जिससे पाली और अपभ्रंश का विकास हुआ. ये सिलसिला लगभग 1000 ईस्वी तक चला और फिर आधुनिक आर्य भाषा का विकास हुआ. जैसे – खड़ी बोली, भोजपुरी, मागधी, बंगाली, गुजरती, मराठी, मैथिलि, राजस्थानी, पहाड़ी, पंजाबी, असामी, उर्दू इत्यादि भाषा.

प्रश्न अब ये है कि क्या सभी भाषा हिंदी ही है, अगर हाँ तो फिर ये एक जैसी क्यों नहीं है?

दरअसल हिंदी का मूल अर्थ है “हिंदुस्तान की भाषा.”

भारत में आने वाले व्यापारियों ने सबसे पहले भारत को हिंदुस्तान कहा. हिन्दू शब्द की उत्त्पत्ति सिन्धु नदी के कारण हुई, और सिन्धु के घाटी में रहनेवालों को इस कारण हिन्दुस्तानी कहा गया. और उनके द्वारा बोली जाने वाली बोली हिन्द्वी कहलाई जो बाद में हिंदी बन गयी.

हिंदी की व्याकरणिक संरचना खड़ी बोली की है, जो दिल्ली के आसपास की बोली है. हिंदी के शब्कोश में देशज, विदेशज (पुर्तगाली, तुर्की, फारसी, अरबी आदि), तत्सम (संस्कृत), तद्भव (संस्कृत शब्दों का विकृत रूप) का समावेश है.

आज़ादी के समय गाँधी ने कहा था हमें हिन्दुस्तानी भाषा को बढ़ावा देना चाहिए, जो कि उस समय प्रचलित थी, यानि अरबी, फारसी शब्दों से भरी हुई भाषा, जो आज भी हिंदी बोलचाल की भाषा है. परन्तु किसी करणवश नहीं हो सका. और संस्कृत के शब्दों से भरी हुई भाषा को हिंदी का नाम दिया गया.

यानि हिन्दुस्तानी भाषा को छानकर फारसी और अरबी शब्दों को हटाया गया और संस्कृत तथा देसज शब्दों को मिलाकर हिंदी का नाम दिया गया.

वहीं दूसरी तरफ अरबी और फारसी शब्दों के समावेश से उसी हिन्दुस्तानी भाषा से उर्दू भाषा बनी, जिसे पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा घोषित की गयी.

परन्तु आज भी पाकिस्तान और हिंदुस्तान में थोड़े से शब्दों को फेर-बदलकर हिन्दुस्तानी भाषा ही बोलते है, जिसे लोग भ्रमवश हिंदी और उर्दू समझ रहे हैं.

   — “Rakesh Kumar Ranjan”

लेखन प्रक्रिया में नौसिखिये की अभिव्यक्ति।

अचानक मेरे मन में एक प्रश्न आया कि क्या मैं पत्रकार बन सकता हूँ?

मैं इतना लिखता तो हूँ कि खुद को प्रोत्साहित कर पाऊं। मैं अपनी अभिव्यक्ति को सीधे तौर पर औरों के समक्ष नहीं रख पाता हूँ परन्तु मैं लिख कर रख सकता हूँ। और ये पन्ना वो जगह है जहाँ अपनी अभिव्यक्ति को परोस सकता हूँ। यहाँ कोई हिचकिचाहट नहीं है। यहाँ मेरी भाषा और उच्चारण पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता। मैं इस पन्ने पर अपने विचार को स्वछन्द विचरण करवाता हूँ। एक-एक पंक्तियाँ मुझे अपने-आप में बहुमूल्य लगती है। मेरे अन्दर लेखन-सृजनात्मकता (writing-creativity) मुझे खुद में सबसे अलग नज़र आती है। न जाने क्यूँ खुद पर नाज़ आने लगता है। मैं खुद से पूछता हूँ – क्या मैं लेखक हूँ? क्या मैं विचारक हूँ? या फिर इस पन्ने पर अपनी अभिव्यक्ति परोसने वाला हिंदी-लेखन प्रक्रिया में अग्रसर छोटा सा नौसिखिया।

लिखने कि वज़ह, मुझे पता नहीं। पर लिखे जा रहा हूँ। जैसे मेरे अन्दर कोई ऐसी शक्ति जो मेरे ज़ुबान पर बैठकर बोले जा रही है और मैं लिखे जा रहा हूँ। मुझे लिखने के लिए सोचने की भी आवश्यकता नहीं पड़ रही है।

प्रश्न अब ये है – मैं लिख क्यों रहा हूँ ? क्या मैं इसे किसी को पढ़कर सुनाऊंगा या फाड़कर फ़ेंक दूंगा ? अगर सुनाऊंगा तो किसे। चलो सुना भी दिया तो सुननेवाले की प्रतिक्रिया क्या होगी। क्या वो मेरा मजाक उड़ाएगा या फिर मेरी हिंदी-लेखन की अभिरुचि को देखकर प्रोत्साहित भरे दो शब्द कहेंगे।

अपने मन की बात कहूँ – अगर सुननेवाले ने प्रोत्साहित भरे दो शब्द कह दिए तो ऐसा लगेगा जैसे उसने उन दो शब्दों को अग्रिम भुगतान के रूप में मेरे अगले सैकड़ों लेखों के लिए प्रोत्साहित किया।

इस लेख को कई बार पढ़ा। इस लेख के अन्दर मुझे एक अलग दुनिया नज़र आई। ऐसा लगा कि “सिर्फ मैं हूँ और मेरा ये लेख।” शेष दुनिया शून्य नज़र आई। पर जैसे ही इस लेख से अलग ध्यान हटाता हूँ ये लेख शून्य नज़र आता है।
इस लेख को लिखते वक्त मेरे अन्दर द्वंद्व विचार विचरते हैं। मैं सोचता हूँ – इस लेख को पढने वाले किस नज़र से देखेंगे मुझे। क्या इस लेख को मेरे नज़रों से पढ़कर मुझ (नौसिखया) को समझने कि कोशिश करेंगे या फिर यहाँ भी रूचि(Interest) या अ-रुचि (Non-interest) वाला भाव आएगा।

मेरे पास शब्द विन्यास कि प्रचुरता नहीं है। लिखने कि कोई कला नहीं है। न-ही पंक्तियों की किसी विशिष्ट समुह द्वारा अपने सटीक भाव को रख सकता हूँ। फिर भी एक अदृश्य शक्ति मेरी भावनाओं को उद्वेलित करती है, मुझे प्रेरित करती है लिखने के लिए।

मैंने ऊपर ज़िक्र किया कि “क्या मैं पत्रकार बन सकता हूँ?” हाँ बिलकुल ! ये प्रश्न मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोर कर रख देता है। क्या लिखने की चाह ही पत्रकारिता के लिए सबकुछ है।

पत्रकारिता क्या है? एक पत्रकार के क्या उद्देश्य हैं? मुझे कुछ नहीं पता। लेकिन कई बार जब अख़बारों में समाज की कुरीतियों या किसी अन्य विषय पर मर्मभेदी टिप्पणी या आलेख पढता हूँ तो उस आलेख में मेरे सोच की प्रतिछाया दिखने लगती है। मुझे लगता है कि ये तो मेरी सोच है। और इस आलेख को किसी पत्रकार या आलेखकार ने ही तो लिखी होगी तो फिर मैं क्यों नहीं।

फिर मैंने अनुभव किया – मेरे पास संवेदना, भावना और अनुभूति कि इतनी प्रचुरता है कि मैं लिखे बिना रह ही नहीं सकता।

   — “Rakesh Kumar Ranjan”

विवशता या इच्छाशक्ति की कमी

अंततः ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली और मैं घर नहीं जा पा रहा हूँ।

आज इस व्यस्तता के दौर में जब कभी अपने अतीत में झांक कर देखता हूँ तो मन में एक उथल-पुथल सी मच जाती है। बरबस ही दिल भर जाता है, चेहरे पर उदासी रेखांकित हो जाती है।

क्या हमने यही सोचा था, अपने भविष्य के बारे में? हमने पढाई इसीलिए की थी। एक-एक रुपये जोड़-जोड़ कर मेरी पढाई के लिए पिताजी ने फीस भरी थी। सोचा था की बेटे को भविष्य में कोई कष्ट न हो, इसलिए खुद कष्ट सहकर मुझे पढाया, अच्छी डिग्री दिलवाई। पर आज जब खुद को इस हाल में पाता हूँ, आंसू गिरने लगते है.

इस वैश्वीकरण के दौर में अपने, पराये बन गए हैं और पराये से अपनापन दिखाना पड़ता है। और-तो-और कुछेक का साथ ऐसा लगने लगता है कि ये मेरे जन्मों के साथी हैं। मां – पिताजी का ख्याल शायद ही कभी ज़ेहन में आये पर यहाँ पर ऐसे बहुत से हमारे सम्बन्धी बन गए जिनको अपनापन दिखाना पड़ता है, उनकी नाराजगी का ख्याल रखना पड़ता है। माँ -पिताजी, वहाँ कोसों दूर बैठे, बेटे की सलामती की दुआ मांग रहे हैं। वो इस बात को सोंचकर खुश होंगे कि बेटा राजी-ख़ुशी कमा रहा है और चैन से ज़िन्दगी जी रहा है। परन्तु यहाँ मेरी स्थिति इतनी दयनीय है की मैं खुद से नज़रे नहीं मिला पा रहा हूँ । कहने को तो आज़ाद हूँ पर एक-एक पल गुलामी की जंज़ीरों से जकड़ा हुआ है। बस एक स्वचलित यन्त्र बनकर रह गया हूँ। जहाँ दिल की चलती ही नहीं है। दिल कुछ और कहता पर समय के नज़ाकत समझना पड़ता है।

रात में बिस्तर पर सोने जाता हूँ तो ये सोचकर की सुबह जल्दी उठना है। कई बार आधी रात में ही नींद खुल जाती है और घडी देखकर ख़ुशी मिलती है कि अरे अभी तो आधी रात बांकी है। पर उतना ही दुखी तब होता हूँ जब सुबह फिर घडी देखता हूँ। कई बार बिस्तर पर पड़े-पड़े झपकियाँ लेता हूँ और इसी क्रम में आधा घंटा लेट हो जाता हूँ । बिस्तर से उठते ही मशीन बन जाता हूँ, टाइमिंग मशीन। एक बार चाबी दिया तो एक घंटे के भीतर ही सार काम निबटा के ऑफिस पंहुचकर ही इंसानी रूप में आ पाता हूँ यानि रिलैक्स महसूस करता हूँ । पर वो भी क्षणिक मात्र, जब तक की सीनियर्स या बॉस नहीं आए हो । उनके आते ही फिर खुद को चाबी देकर मशीन बन जाता हूँ । फिर काम, काम और सिर्फ काम। थोड़ी सी ख़ुशी लंच टाइम में तब मिलती है, जब सभी कलिग (सहयोगी) एकसाथ बैठते हैं। खाना से ज़्यादा तो गप्पे मारकर खुद को तरोताज़ा महसूस करता हूँ।

सबसे ज्यादा रिफ्रेशमेंट तो तब होती है जब सभी लोग  काम के प्रेशर में शान्ति से काम कर रहे होते हैं और जिसका काम सफलतापूर्वक हो गया हो वो अचानक से किसी की खिचाई करे और सारे कलिग के चेहरे पर ख़ुशी खिल उठे। ओह्फ़— सच में– कॉलेज के दिन याद आ जाते है। पर उतनी ही तकलीफ तब होती है जब सीनियर आकर आँखे दिखाए। ओह्फ्फ़–!  तब तो ज़िन्दगी, जहन्नुम लगने लगती है।

घंटे-पर-घंटा, दिन-पर-दिन और फिर महीना ख़त्म होने को हो जाता है। जैसे ही सैलरी की तारीख आई, पता नहीं — अन्दर से अजीब सी ख़ुशी आ जाती है। शायद, उसी दिन सिर्फ मेरा मन खुश होता है। वो भी पूरी ख़ुशी मिलती है। ऐसा लगता है कि आज के एक दिन की ख़ुशी के लिए ही, पिछला तीस दिन हँस के दुःख झेला। जबकि मेरे बैंक के खाते में अभी भी पर्याप्त पैसे है पर न जाने क्यूँ ऐसा लगता की आज अगर सैलरी की तारीख पर, नीयत समय पर सैलरी नहीं मिली तो पिछले तीस दिन की अरमानों और इच्छाओं से बनी ख़ुशी की दुनिया तबाह हो जायेगी। जबकि मैं भी जानता हूँ दी अगले एक सप्ताह सैलरी न मिले तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

काम करते – करते कई वर्ष गुज़र गए पर आज भी मेरे  पास पर्याप्त रुपये जमा नहीं हो पाए, जितने की आशा करता हूँ । एक अच्छा कपडा सिर्फ इसलिए नहीं खरीदता हूँ कि अतिरिक्त खर्च पर काबू पाकर पैसे बचाऊं और घरवालों की मदद करूँ। पर ये मन कपड़े की ख़रीद पर तो काबू पा लिया परन्तु गर्लफ्रेंड की एक छोटी ख्वाहिश पर लुटा दिया।

जब छोटा था तो चाची, बुआ, दादी, बड़ी दीदी सभी कहतीं थी जब तुम कमाओगे तो मेरे लिए अच्छे – अच्छे कपड़े ला देना । पर यहाँ इस संवेदनहीन माहौल का सामना करते-करते मैं खुद असंवेदनशील बन गया हूँ। वो दादी की बूढी आँखें आज भी याद है मुझे, कितना प्यार झलकता था उसमें । एक हलकी आह पर, पूरा घर सर पर उठा लेती थी। कितनी आशाएं थी मुझसे, दादी को।

आज घर से फ़ोन आया -“दादी नहीं रही दुनिया में।” मैं उस समय ऑफिस में बौस के सामने था। न मैं रो पा रहा था न ही कोई प्रतिक्रिया दे रहा था, बस जैसे मैं  ज़मीन में गड़ा जा रहा था।  मैं निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ – ये हमारी विवशता है या इच्छाशक्ति की कमी।

                                                                                           — “Rakesh Kumar Ranjan”

“बेबस लड़की” – अपने को हीन समझती हूँ ।

मैं एक लड़की….
अपनी ही बात कहती हूँ
घड़ी-घड़ी, हर पग-पग पर
अपने को हीन समझती हूँ ।

है जिस दिन मैंने जनम लिया
न गीत बजी न शहनाई,
पर, नया संसार मिला
अपने और अनजानों की
खुशियां अपार मिली

फिर हंसती-खेलती हुई बड़ी
एक अल्हड़-उम्र के सीमा पर हुई खड़ी
माँ कहती -ज्यादा हंसों नहीं
पापा कहते – ज्यादा खेलो नहीं
दादी कहती – पढ़-लिखकर तुम कुछ नहीं कर सकते
कभी-कभी तो शिक्षक भी है लड़कों को बड़े समझते।

राहों पर निकलूं तो सबकी निगाहें घूरती ऐसे,
हमने कोई गुनाह किया हो जैसे।
पर गलती है क्या मेरी ?
मैं ये नहीं समझती हूँ।

घड़ी-घड़ी, हर पग-पग पर
अपने को हीन समझती हूँ ।
मैं एक लड़की…. अपनी ही बात कहती हूँ ।

— “Rakesh Kumar Ranjan”

काश ! ये आंसू गिर पाते ।

काश ! ये आंसू गिर पाते ।

बड़ा बोझिल है
ये आंसू
न कद बड़ा न,
वजन है भारी
फिर भी दुनिया,
इसी से हारी

दिल टूटा तो आंसू गिरे
रोकना चाहा पर ना रुके
रोक-रोक के थक कर हारा
आंसू रोक न पाया दिल बेचारा

आंसू गिरा हुआ निर्बोझ
बावला मन को आया होश
सह न सके गर दिल कोई बात
आंसू के सहारे वो बात भुलाते
काश ! ये आंसू गिर पाते ।

“Rakesh Kumar Ranjan”

काश ! अगर मैं शायर होता ।

काश ! अगर मैं शायर होता ।
तेरी अदाओं की शायरी करता
शायरी के हर-एक पंक्ति में तुझे सताता
कभी तेरे बालों को सहलाता
कभी उसमे अपने चेहरे को छुपाता
रहता तेरे दिल में ही
पर मुझे देखने को तेरा दिल बहुत तड़पता
काश ! अगर मैं शायर होता ।   

—   “Rakesh Kumar Ranjan “

“मन-परी” – मेरे सपनों की !

आधी रात थी। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, जैसे असंख्य दीये जल रहे हो और मंद बयार के झोंकों से दीये खुद को बुझने से बचा रही हो। वातावरण शांत-शीतल-स्नेहयुक्त थी। इतने तंदरुस्त, इतने चौकन्ने कि होंठ भी हिले तो इसकी खबर दूसरे कानों तक पंहुचा देते।

ऊपर नभ (आकाश) में सुनहरे रत्न जड़ित, स्लेटी रंग के वस्त्र में “चाँद” दुधिया बादल के घूंघट से मुस्कुराते हुए सब देख रहा था ।

आँखों के सामने विचित्र सुखकर-माहौल था। खिड़की के झरोंखो से, विश्व के समूचे-सुन्दरता को अपने अंतर में समेटी, तारों-जड़ित, स्याही-वस्त्र धारण किये, मेरी “मन-परी” मुझे निद्रावस्था में निहार रही थी। एक-क्षण तो मैंने महसूस किया कि स्वप्न देख रहा हूँ, तत्क्षण, मैंने पलकों को बार-बार झपकाया, परन्तु, पुर्वोवस्था कि भांति आँखों के सामने वही दृश्य आसीन थी। मैं उसे हैरान मुद्रा में बस निहार रहा था। हम दोनों परस्पर एक-दूसरे को देखे जा रहे थे।

इधर, मध्य-रात्रि को मैं विक्षिप्तावास्था में बेसुध होकर तड़प रहा था।

मैं उससे कुछ पूछना चाहा, इतने में उसने स्याही-बदरी सी घूंघट अपने आधे चेहरे पर खिसका लिया, तो मेरे चेहरे पर भी परेशानी की स्याही-बदरी साफ नज़र आने लगी। कुछेक-क्षण वो इसी तरह घूंघट कि आड़ से आँख-मिचौली खेलता रहा। अपितु, वो घड़ी आई जब वो बेपर्द मेरे सम्मुख खड़ी थी।

तत्पश्चात, मैं उसके समीप जाना चाहा। जितना पास जाना चाहा, वो उतनी ही दूर जाती रही। अभी मैंने बोला ही था – “हे कौमार्ये! हे मनभावने! अति-सुन्दरे!” कि मैं खिड़की के झड़ोखों से टकरा गया। अचानक अनुभव किया कि – “मैं नींद से जाग गया”!

फिर मैंने महसूस किया – अभी मैं स्वप्न में ही कल्पना जगत का अधिवासी (ख्यालों में रहने वाला) था। जिसे मैं अपने “मन-परी” समझ रहा था वो तो कोई और दूर-देश नभराज (अाकाश) की राजकुमारी “चाँद” थी।

                                                                                          — “Rakesh Kumar Ranjan”

न जाने किसे पुकारता हूँ.

न जाने किसे पुकारता हूँ !

“खुदा नहीं है”
ये औरों से कहता हूँ,
‘ख़ुद’ न जाने किसे पुकारता हूँ |

मंदिर-मस्जिद, गिरजे – गुरुद्वारे,
माथा टिकते देख
मन-ही-मन हँस लेता हूँ ,
दुनिया को, अंधविश्वास का,
जीवित रूप कह देता हूँ|

परन्तु, अचानक, ये क्या…
दुःख की हलकी आहट पाकर
पता नहीं किसके आग़ोश में
छुपकर सो जाता हूँ|

फिर, साहस पाकर पुनः
उसी रंग में ढल जाता हूँ|

“खुदा नहीं है”
ये औरों से कहता हूँ,
‘ख़ुद’ न जाने किसे पुकारता हूँ .

“Rakesh Kumar Ranjan”

धर्म की आड़ में मानवता का हनन !

धर्म का वास्तविक परिभाषा देना कठिन है. फिर भी अनेक विद्वानों ने अपने-अपने मत से कई तरह की परिभाषाएँ दी. परन्तु किसी को धर्म विशेष परिभाषा कहना उचित न होगा. क्यूंकि जितने मत, उतने धर्म.

ऐसा माना जाता है कि जब मानव की बुद्धि-गति, विकासशील थी या फिर उसने अपना जब होश संभाला तो बढ़ते मानवीय आत्माओं की कुवृतियों को देखकर एक संविधान बनाया, वस्तुतः धर्म कहलाया. जिसका पालन अनिवार्य था. लोग पालन करते भी थे. परन्तु चोरी-छिपे, दूसरों की हित-अहित सोंचे बिना, जाने-अनजाने में वो ऐसे कर्म कर जाते जो सर्वमान्य नहीं था. उनका ये कार्य दूसरों के दुखों का कारण होता था. बढ़ते दुखों से त्राहिमाम होते जन-साधारण को देखकर, बुद्धिजीवी लोगों ने सोचा–हमने तो लोगों के कर्म पर पाबन्दी लगा दी परन्तु मन तो गन्दा ही है. वो ऐसे गंदे मन के कारण दूसरों की हित-अहित का ख्याल नहीं करेंगे. इसलिए सीधा निशाना मन पर ठाना.

बुद्धिजीवि वर्गों के मानवों ने एक ऐसे सिद्धांत का प्रतिपादन किया जो सर्वमान्य हो गया. जिसे धर्म से संबोधित किया जाता है. उनहोंने कहा – गलत करोगे ऊपरवाला देखेगा. जनसाधारण ने सोचा – क्या वास्तव में कोई ऊपरवाला है ? हो भी सकता है, अगर नहीं होता तो तो ये सारी दुनिया नियमानुसार कैसे चलती. न एक तिल इधर, न एक तिल उधर. सब कुछ व्यवस्थित. सुचारू रूप से चल रहा है.

सिद्धांत की पहली बातें भी सर्वजन को मान्य हुई. फिर दूसरा सन्देश जनमानस को दिया – “सभी मनुष्य के अन्दर आत्मा में परमात्मा बसता है.” इससे लोगों की चाह बढ़ी. अरे वाह ! परमात्मा मेरे अन्दर है. सबने ढूंढने की कोशिश की. पर राह किसी ने न देखी थी. उन्होंने कहा – “परमात्मा दर्शन का एक मात्र उपाय है. एक मात्र राह है और वो है ध्यान मार्ग. लोगों ने ध्यान लगाना शुरू किया और वास्तव में शांति है तो उनके दर्शन के बाद तो शायद जिन्दगी ही बदल जाय.

उनके सिद्धांत का यह रूप भी काम आया. ये भी सर्वमान्य हो गया. क्यों की हर किसी को आँखें बंद करने के बाद अंधकार और उस अंधकार में आप जिस किसी को एकाग्रचित्त होकर मन से सोचेंगे, उसकी प्रतिछाया जरूर दिखेगी, क्याेंकि मानवीय मस्तिष्क की बनावट ही कुछ इस तरह की है.

बुद्धिजिविओं ने कहा – आप जितने क्षण ईश्वर से संपर्क स्थापित करते है. उतने क्षण आप दुखों से वंचित रहोगे. अरे भाई ! ये तो प्राकृतिक है. जरा सोंचिये ! बुद्धिजीविओं ने कहा परमात्मा से संपर्क साधने का एक ही रास्ता है – ध्यान. और ध्यान शांत मुद्रा में की जाती है. वो भी मन के विकारों काे हटाकर. जब मन से विकार हट जाएगा तो – दुःख कहाँ. मतलब, जितने क्षण ध्यान करते हैं. उतने क्षण आप गलत या अहित करते ही नहीं, आपका मन साफ है तो परिणाम स्वरूप तनाव या दुःख होगा ही नहीं.

हजारों वर्षों से दुनिया चलती आ रही रही है. जितने क्षेत्र, उतने ही क्षेत्र में अलग-अलग धर्म की उत्पत्ति हुई. हरेक क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति एवं उससे पनपे माहौल ही धर्म के विकास का कारण बना. सभी धर्म के अलग-अलग देवता भी हैं. हमारे पूर्वज, अपने देवताओं द्वारा किये गए कार्यों को आनेवाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी में सुनाते आ रहें हैं. उनकी पूजा और कर्म का अनुसरण करना ही धर्म माना जाता है. कभी-कभी तो अपने देवताओं को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की होड़ लग जाती है. यहाँ तक कि ये भी देखा गया है कि लोग अपने धर्म को छोड़कर किसी और धर्म में शामिल हो जाते हैं. फिर, कल तक जिस धर्म के लिए मरने-मारने के लिए तैयार थे आज उसी धर्म को हेय (घृणा) की दृष्टि से देखते हैं.

आज समूचे दुनिया में शिक्षा और तकनीकि का विकास इतनी तीव्र गति से वृद्धि होने के बावज़ूद कुछ लोग धर्म शब्द का प्रयोग कर गलत फ़ायदा उठा रहे है. जिससे इंसानी आस्था और विश्वास एक-दूसरे इंसान के साथ दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है.

आधुनिक समय में धर्म एक ऐसा समुदाय प्रतीत होता है जो अपने धर्मावलम्बियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ाने में लगी हो. ताकि उनके धर्म का साम्राज्य हो सके.

वैश्वीकरण के कारण अनेक जाति-धर्म का समागम हुआ है. बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से परेशान होकर लोग अपने गाँव-शहर को छोड़कर दूसरे शहर, देश अथवा विदेश जाने को मजबूर हैं और वो वहाँ चाहकर भी जाति-धर्म को मान नहीं पाते हैं. जिस कारण जाति-धर्म के रुढ़िवादी रवैये से मुक्ति मिल जाती है. परन्तु कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों के कारण मानवता शर्मसार हो रहा है. वो “धर्म की आड़ में मानवता का हनन” करते रहें हैं. आज जब समस्त मानव भयंकर प्राकृतिक आपदा तथा प्राकृतिक साधन  की कमी को झेलने पर विवश हैं तो क्या ऐसी स्थिति में समस्त धर्म-समुदाय को एकजुट होकर एक धर्म को नहीं मान लेना चाहिए -“इंसानियत का धर्म”.

हिंदी के साथ सौतेला व्यवहार क्यूँ ?

इस वैश्वीकरण के दौर में हिंदी ने अपना सबकुछ खो दिया है. अपना अस्तित्त्व तक खो दिया. उसकी महत्ता पर सवाल उठने लगें हैं. यहाँ तक की बड़े शहरों में तो हिंदी बोलना अब शर्म की बात हो गई है. हिंदी की अपनी ही भूमि पर, हिंदी बोलने वालों की अवहेलना होती है और अंग्रेजी जानने वालों तथा बोलने वालों को ज़्यादा सम्मान दिया जाता है. अंग्रेजीभाषी को लोग ज़्यादा प्रतिभावान समझते हैं, और न जाने क्यूँ हिन्दीभाषी अपने आप को अंग्रेजी के सामने खुद को ठगा सा महसूस करते हैं. आख़िर ऐसी विडंबना क्यूँ ?

हिंदी हमारी संस्कृति है. ये हमें खुद को होने का एहसास दिलाती है. इसके बिना हम खुद को भूलते जायेंगे. पर ये बातें पश्चिमी सभ्यता के तरफ आकर्षित लोगों को कैसे समझाएँ और किस – किस को समझाएँ. आज इस बढती पश्चिमी सभ्यता के फैशन का चलन, इस कदर हमारे मन-मष्तिष्क पर हावी हो गया है की हम संवेदनहीन होते जा रहें हैं. हमारे दिलों में बड़ों के प्रति इज्जत और छोटों के प्रति प्यार कम होता जा रहा है. क्यूंकि, हम खुद को इतना व्यस्त कर लेते हैं, हमारे पास समय ही नहीं बच पाता है, किसी के बारे में सोचने का. हम एक मशीन बनकर रह गए गए हैं, एक स्वचालित मशीन. हमने खुद को जितना विकसित किया उससे कही ज़्यादा और होना चाहते हैं. पर हिंदी अधिक अनुसरण करने वालों घरों में अभी भी वो जज्बात जीवित है. शायद हिंदी में संवेदनशीलता अधिक है. उसमे विनम्रता है.

वस्तुतः हिंदी भाषा, संस्कृत की उत्पत्ति मानी जाती है. जब एक अशिक्षित आदमी, संस्कृत बोलने की कोशिश की होगी तभी हिंदी का जन्म हुआ होगा. क्योंकि संस्कृत कठिन भाषा मानी जाती थी. पर बढ़ते शिक्षा-प्रसार के कारण भाषा की निपुणता आवश्यक मानी जाने लगी होगी. और इस तरह से हम कह सकते हैं कि – ” टूटी – फूटी संस्कृत बोलने कि कोशिश का ही परिणाम हिंदी है”. एक हिंदी ही नहीं बल्कि समस्त भारतवर्ष के क्षेत्रिय भाषाएँ संस्कृत कि ही देन मानी जाती है.

हिंदी भाषा के शब्दकोष को अगर टटोला जाए तो, वो हरेक शब्द उपलब्ध हैं, जिनकी हमें आवश्यकता है. परन्तु उन शब्दों को अनदेखा करके उर्दू या अंग्रेजी या फिर कोई और विदेशज शब्दों को स्थान देते हैं. हम छोटी-छोटी बातों पर ध्यान न देते हुए बेधरक विदेशज शब्दों का प्रयोग करते हैं और यही शब्द हमारी आने वाली पीढ़ी तक पहुँच जाती है. बच्चे तो बच्चे होते है. उन्हें जैसा माहौल मिलता है वो उसका अनुकरण करते जातें हैं. वे उसी में ढलते जातें हैं. अधिकांशतः तो बच्चे घर में ही सीखते हैं या फिर विद्यालय अथवा सड़कों पर. उन्हें जो शब्द जहाँ पर सुनने को मिलता है, वो शब्द उनके अवचेतन में उसी समय बैठ जाता है और वैसा भाव आते ही उस शब्द का प्रयोग करते हैं. बच्चे तो बच्चे, आज तो एक शिक्षित आदमी हैं वो भी हिंदी न शुद्ध बोल पातें हैं और न ही शुद्ध लिख पाते हैं.

प्रश्न ये उठता है की भाषा क्या है ? “मानवीय चेतना में उत्त्पन्न भाव को किसी दूसरे तक पँहुचाने की प्रकिया ही भाषा है”. तो वो भाव हम संकेतों के माध्यम से भी तो पहुँचा सकते हैं. हमें बोलने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? कारण जो भी हो, हमें सिर्फ इतना जान लेना चाहिए कि हमारी भौगोलिक स्थिति के कारण ही रीति-रिवाज़ का जन्म होता है. रहन-सहन, खान-पान और उठने बैठने का तरीका सब भौगोलिक स्थिति या हमारे आस-पास के माहौल से ही पनपता है. रहन-सहन और उठने बैठने कि स्थिति ही हमारे अच्छे-बुरे संस्कारों को प्रदर्शित  करती है. पर आज इस वैश्वीकरण के दौर में ये सभी बाते एक रुढ़िवाद का उदाहरण बनकर रह गईं हैं. परन्तु संस्कार तो हमारी पहचान है. हमारा अस्तीत्त्व है. इसे खोने का अर्थ है कि हमने अपनी पहचान  खो दी. जिस तरह किसी एक जाति में किसी अन्य जाति का समावेश होकर एक अलग प्रजाति का जन्म होता है और फिर धीरे-धीरे उस मूलजाति का अंत हो जाता है. ठीक उसी तरह हमारी हिंदी कि स्थिति है. क्या हमें इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है? आज इस बदलते परिवेश में, हिंदी अपने ही घर मन सौतेलापन का मार झेलने पर विवश है. आखिर क्यूँ?…………….